*मदरसों की तस्दीक़ व्यवस्था में होगा बड़ा बदलाव, शहर क़ाज़ी कार्यालय ने तैयार किया नया फ़ॉर्म*
मदरसों की तस्दीक़ व्यवस्था में होगा बड़ा बदलाव, शहर क़ाज़ी कार्यालय ने तैयार किया नया फ़ॉर्म
*एडवोकेट अशरफ़ जहीर हाशमी के सवालों के बीच शहर क़ाज़ी की नई पहल; दस्तावेज़ों की जांच, जरूरत पड़ने पर मौके पर सत्यापन और हर मदरसे का रिकॉर्ड रखने की तैयारी*
देहरादून। मदारिस के नाम पर बाहर से आने वाले लोगों द्वारा चंदा मांगने और उन्हें जारी होने वाली तस्दीक़ को लेकर उठ रहे सवालों के बीच देहरादून में मदरसों की तस्दीक़ व्यवस्था में बड़े बदलाव की तैयारी की गई है। शहर क़ाज़ी देहरादून के कार्यालय की ओर से जारी एक प्रेस नोट में बताया गया है कि मदरसों की तस्दीक़ को अब अधिक पारदर्शी और व्यवस्थित बनाने के लिए नया “फार्म बराए तस्दीक़नामा” तैयार किया गया है, जिसे जल्द सार्वजनिक किया जाएगा।
यह मामला उस समय चर्चा में आया जब प्रोग्रेसिव कम्युनिटी ट्रस्ट, देहरादून के उपाध्यक्ष एडवोकेट अशरफ़ जहीर हाशमी ने पहले शहर क़ाज़ी देहरादून मौलाना मुफ़्ती हाशिम अहमद क़ासमी को पत्र भेजकर मदरसों के नाम पर बाहर से आने वाले लोगों द्वारा चंदा मांगने और तस्दीक़ जारी किए जाने की प्रक्रिया पर कई सवाल उठाए थे।
शहर क़ाज़ी से पूछे थे कई सवाल
एडवोकेट अशरफ़ जहीर हाशमी ने अपने पत्र में पूछा था कि बाहर से आने वाले मदरसों के नुमाइंदों को तस्दीक़ किस आधार पर दी जाती है और क्या तस्दीक़ जारी करने से पहले संबंधित मदरसे की वास्तविक स्थिति, छात्रों की संख्या, आर्थिक जरूरत और अन्य जानकारी की जांच की जाती है।
उन्होंने यह भी सवाल उठाया था कि तस्दीक़ के लिए किसी तरह की फीस, रकम, चंदा या हदिया लिया जाता है या नहीं। साथ ही उन्होंने यह जानकारी भी मांगी थी कि शहर क़ाज़ी के अलावा किसी अन्य व्यक्ति या संस्था को ऐसी तस्दीक़ जारी करने का अधिकार है या नहीं।
हाशमी का कहना था कि देहरादून में बड़ी संख्या में स्थानीय गरीब, यतीम, बेसहारा परिवार और जरूरतमंद मौजूद हैं। ऐसे में यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि लोगों की ओर से दी जाने वाली मदद सही और वास्तविक जरूरतमंद तक पहुंचे।
जवाब नहीं मिलने पर उलमा के नाम लिखा खुला पत्र
एडवोकेट हाशमी के मुताबिक, उनके पहले पत्र का उन्हें कोई जवाब नहीं मिला। इसके बाद उन्होंने क़ाज़ी-ए-शरियत देहरादून मुफ़्ती सलीम अहमद क़ासमी और देहरादून के तमाम उलमा-ए-किराम के नाम एक खुला पत्र जारी कर इन सवालों पर रहनुमाई मांगी।
खुले पत्र में उन्होंने साफ किया कि उनका मकसद किसी व्यक्ति, मदरसे या संस्था को बदनाम करना नहीं, बल्कि चंदे के मामले में पारदर्शिता लाना, स्थानीय जरूरतमंदों के हक की रक्षा करना और मदारिस के प्रति जनता का भरोसा कायम रखना है।
अब शहर क़ाज़ी कार्यालय ने नई व्यवस्था का किया ऐलान
इसी बीच शहर क़ाज़ी कार्यालय की ओर से जारी प्रेस नोट में बताया गया है कि ईद के बाद से मदरसों की तस्दीक़ व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए लगातार अध्ययन और सुधार का काम किया जा रहा था।
कार्यालय के अनुसार विभिन्न प्रमाणन संस्थाओं की सत्यापन प्रक्रिया और फॉर्मेट का अध्ययन करने के बाद मदरसों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए नया फॉर्म तैयार किया गया है।
नई व्यवस्था के तहत पहले से चली आ रही तस्दीक़ व्यवस्था में बदलाव किया जाएगा और तस्दीक़ के लिए निर्धारित फॉर्म के साथ जरूरी दस्तावेज़ देना अनिवार्य होगा।
मदरसे की पूरी जानकारी देनी होगी
नए फॉर्म में मदरसे से जुड़ी कई महत्वपूर्ण जानकारियां मांगी जाएंगी। इनमें—
मदरसे का नाम और पूरा पता
मोहतमिम/नाज़िम की जानकारी
मजलिस-ए-शूरा या ट्रस्ट का विवरण
रजिस्ट्रेशन और मान्यता की जानकारी
जमीन और भवन के दस्तावेज
छात्रों की कुल संख्या
स्थानीय और बाहरी छात्रों का विवरण
पढ़ाई की व्यवस्था
शिक्षकों और अन्य स्टाफ की संख्या
शामिल है।
इसके अलावा ऑडिट रिपोर्ट, सालाना खर्च, वार्षिक परीक्षा परिणाम, रसीद बुक/सीरीज़ और हालिया रसीद भी उपलब्ध करानी होगी।
नई व्यवस्था में मदरसे की इमारत और बोर्ड की GPS कैमरे से ली गई तस्वीर, पढ़ाई की गतिविधियों की वीडियो, किसी प्रतिष्ठित संस्था की तस्दीक़ और स्थानीय सम्मानित लोगों की जानकारी भी मांगी जाएगी।
शहर क़ाज़ी कार्यालय के अनुसार दस्तावेज़ मिलने के बाद उनकी बारीकी से जांच की जाएगी। जरूरत पड़ने पर अधिकारी मौके पर जाकर मदरसे की वास्तविक स्थिति और पढ़ाई की गतिविधियों का भी सत्यापन करेंगे।
प्रेस नोट के मुताबिक, सभी दस्तावेज़ों और जांच से संतुष्ट होने के बाद ही शहर क़ाज़ी मुफ़्ती हाशिम अहमद क़ासमी की ओर से तस्दीक़नामा जारी किया जाएगा।
इसके साथ ही हर मदरसे का बाकायदा रिकॉर्ड शहर क़ाज़ी कार्यालय में सुरक्षित और व्यवस्थित रखा जाएगा। अगले साल तस्दीक़ के नवीनीकरण के समय पिछले वर्ष का तस्दीक़नामा और ऑडिट रिपोर्ट/बैलेंस शीट देना पर्याप्त होगा। हालांकि मदरसे के पते, प्रबंधन, जमीन-भवन, रजिस्ट्रेशन या पढ़ाई की व्यवस्था में कोई बदलाव होने पर उससे जुड़े दस्तावेज़ देना जरूरी होगा।
शहर क़ाज़ी कार्यालय के अनुसार इस नई व्यवस्था का मकसद किसी मदरसे के लिए परेशानी खड़ी करना नहीं है, बल्कि तस्दीक़ की प्रक्रिया में पारदर्शिता और जनता का भरोसा बढ़ाना, सही और जरूरतमंद मदरसों तक मदद पहुंचाना तथा चंदा देने वालों की रकम का सही जगह इस्तेमाल सुनिश्चित करना है।
शहर क़ाज़ी कार्यालय के इस नए कदम से यह उम्मीद जगी है कि मदरसों के नाम पर चंदा मांगने और तस्दीक़ जारी करने की प्रक्रिया अब अधिक स्पष्ट और जांच पर आधारित होगी।
हालांकि एडवोकेट अशरफ़ जहीर हाशमी की ओर से उठाए गए कुछ सवाल—खास तौर पर तस्दीक़ जारी करने की फीस या किसी तरह की रकम लिए जाने, तस्दीक़ जारी करने का अधिकार और स्थानीय जरूरतमंदों को प्राथमिकता देने से जुड़े सवाल—अब भी स्पष्ट जवाब की अपेक्षा रखते हैं।
ऐसे में देखने वाली बात होगी कि नया तस्दीक़ फॉर्म सार्वजनिक होने के बाद इन सवालों का कितना स्पष्ट समाधान सामने आता है और नई व्यवस्था व्यवहार में किस तरह लागू की जाती है।

