अति आत्मविश्वास और नेताओं की गुटबाजी-
हरियाणा में कांग्रेस की पराजय की बड़ी वजह?
शिब्ली रामपुरी

हरियाणा विधानसभा चुनाव के नतीजे ने सबको चौंका दिया क्योंकि एग्जिट पोल्स के मुताबिक वहां पर कांग्रेस सत्ता हासिल करने जा रही थी और मतगणना के दिन शुरुआती रुझानों में कांग्रेस को बढ़त भी दिखाई दी लेकिन बाद में कांग्रेस की स्थिति कमजोर होती चली गई और तीसरी बार भारतीय जनता पार्टी ने हरियाणा में शानदार कामयाबी हासिल की है.
लोकसभा चुनाव के नतीजे कांग्रेस के हाथ में बेहतर रहने के बाद माना जा रहा था कि हरियाणा विधानसभा चुनाव में कांग्रेस कमाल करेगी और जब एग्जिट पोल ने अपने अनुमान दिखाने आरंभ किए तब यह उम्मीद जगी कि कांग्रेस हरियाणा में सरकार बनाने जा रही है लेकिन कांग्रेस वहां पर हार से रूबरू हो गई और इस पराजय के कई कारण रहे.
हरियाणा में कांग्रेस पार्टी आत्मविश्वास की बजाय अति आत्मविश्वास में डूबी रही और उसने वहां पर आम आदमी पार्टी को भी कोई महत्व नहीं दिया जिसके चलते आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस से अलग होकर चुनावी मैदान में अपने प्रत्याशी उतारे. भले ही आम आदमी पार्टी का वहां पर खाता भी न खुला हो लेकिन कई सीटों पर उसने कांग्रेस को जबरदस्त नुकसान पहुंचाया.
हरियाणा में कांग्रेस के कुछ नेताओं में आपसी गुटबाजी भी हावी रही और यह नेता खुद को एक दूसरे से बढ़-चढ़कर पेश करने में जुटे रहे यही वजह रही कि कांग्रेस को वहां पर अंदरूनी जंग का सामना करना पड़ा जिसका नतीजा हरियाणा विधानसभा चुनाव में नुकसान के तौर पर कांग्रेस को देखने को मजबूर होना पड़ा है. लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने अपने सहयोगियों के साथ चुनाव लड़ा जैसे उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के साथ मिलकर कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने एक नहीं बल्कि कई जनसभाओ को संबोधित किया और यह एकजुटता उत्तर प्रदेश में काफी रंग रंग लाई लेकिन हरियाणा में अति आत्मविश्वास से लबरेज कांग्रेस को गठबंधन के सहयोगियों को विश्वास में ना लेना भारी साबित हुआ है. यहां सवाल राहुल गांधी के लिए भी है कि राहुल गांधी ने लोकसभा चुनाव के दौरान जो वादे किए थे क्या वह उन वादों पर खरे उतर सके हैं क्या उनकी मोहब्बत की दुकान में सभी का स्वागत है या फिर कांग्रेस का संगठन जहां पर मजबूत होता है वह वहां पर अपने सहयोगियों को कोई अहमियत नहीं देती?





