उत्तराखंड देहरादून

मदरसे के नाम पर बाहर से चंदा मांगने वालों पर उठे सवाल, उलमा से मांगा जवाब, शहर काज़ी को पहले भी भेजा था पत्र, जवाब नहीं मिलने पर क़ाज़ी-ए-शरियत और देहरादून के उलमा से एडवोकेट अशरफ़ जहीर हाशमी ने मांगी रहनुमाई

शहर काज़ी को पहले भी भेजा था पत्र, जवाब नहीं मिलने पर क़ाज़ी-ए-शरियत और देहरादून के उलमा से एडवोकेट अशरफ़ जहीर हाशमी ने मांगी रहनुमाई

देहरादून। मदारिस के नाम पर देहरादून में बाहर से आकर चंदा मांगने वाले लोगों की बढ़ती संख्या को लेकर एक बार फिर सवाल उठने लगे हैं। प्रोग्रेसिव कम्युनिटी ट्रस्ट, देहरादून के उपाध्यक्ष एडवोकेट अशरफ़ जहीर हाशमी ने इस मामले में देहरादून के क़ाज़ी-ए-शरियत मुफ़्ती सलीम अहमद क़ासमी और शहर के तमाम उलमा से खुलकर अपनी राय और रहनुमाई करने की अपील की है।
एडवोकेट अशरफ़ जहीर हाशमी ने कहा कि कुछ समय पहले उन्होंने इसी मामले को लेकर शहर काज़ी देहरादून मौलाना मुफ़्ती हाशिम अहमद क़ासमी को एक विस्तृत पत्र भेजा था। पत्र में मदारिस के नाम पर बाहर से आने वाले लोगों द्वारा चंदा मांगने, उन्हें दी जाने वाली तस्दीक और चंदे की रकम के सही इस्तेमाल से जुड़े कई सवाल पूछे गए थे।
उनका कहना है कि अब तक शहर काज़ी की ओर से उनके पत्र का कोई जवाब नहीं मिला है। इसी वजह से उन्होंने अब यह मामला देहरादून के क़ाज़ी-ए-शरियत और तमाम उलमा-ए-किराम के सामने रखते हुए उनसे स्पष्ट जवाब और मार्गदर्शन मांगा है।

हाशमी ने सवाल उठाया कि देहरादून में दूसरे जिलों और राज्यों से आने वाले कई लोग मदारिस और दीनी संस्थानों के नाम पर चंदा मांगते हैं। जब उनसे मदरसे की पढ़ाई, बच्चों की संख्या, आर्थिक स्थिति और वास्तविक जरूरत के बारे में जानकारी मांगी जाती है तो कई बार संतोषजनक जवाब नहीं मिल पाता। इसके बावजूद उनके द्वारा यह कहा जाता है कि उन्हें देहरादून से तस्दीक मिली हुई है।
उन्होंने सवाल किया कि आखिर यह तस्दीक किस आधार पर जारी की जाती है और क्या तस्दीक देने से पहले संबंधित मदरसे और उसकी जरूरत की पूरी जांच की जाती है?

एडवोकेट हाशमी ने अपने खुले पत्र में एक और महत्वपूर्ण मुद्दा उठाते हुए कहा कि शहर में यह बात भी चर्चा में है कि तस्दीक हासिल करने के लिए किसी तरह की रकम देनी पड़ती है।
उन्होंने कहा कि अगर यह बात गलत है तो इसकी साफ तौर पर जानकारी देकर लोगों की गलतफहमी दूर की जानी चाहिए। वहीं अगर किसी तरह की फीस या रकम ली जाती है तो उसकी पूरी व्यवस्था और वजह भी जनता के सामने स्पष्ट होनी चाहिए।

हाशमी ने कहा कि देहरादून में बड़ी संख्या में गरीब, यतीम, बेसहारा परिवार, जरूरतमंद बच्चे और स्थानीय दीनी संस्थान मदद के जरूरतमंद हैं। ऐसे में यह भी देखना जरूरी है कि लोगों द्वारा दिया जाने वाला चंदा पहले स्थानीय जरूरतमंदों तक किस तरह पहुंचाया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि उनका मकसद किसी मदरसे या किसी व्यक्ति का विरोध करना नहीं है। उनका उद्देश्य सिर्फ यह सुनिश्चित करना है कि लोगों की मेहनत की कमाई का चंदा सही जगह पहुंचे और वास्तविक जरूरतमंदों को उनका हक मिले।
उलमा से पूछे कई अहम सवाल
एडवोकेट अशरफ़ जहीर हाशमी ने क़ाज़ी-ए-शरियत और तमाम उलमा से सवाल किया है कि—
बाहर से आने वाले लोगों को चंदा मांगने की तस्दीक किस आधार पर दी जाती है?
क्या संबंधित मदरसे और उसकी जरूरत की पहले पूरी जांच की जाती है?
क्या तस्दीक के लिए कोई फीस, रकम या अन्य भुगतान लिया जाता है?
शहर काज़ी के अलावा क्या किसी अन्य व्यक्ति या संस्था को भी ऐसी तस्दीक जारी करने का अधिकार है?
क्या ऐसा कोई साफ और पारदर्शी सिस्टम बनाया जा सकता है, जिससे लोगों को यह भरोसा हो कि उनका चंदा सही और जरूरतमंद जगह पर जा रहा है?
“मकसद किसी को बदनाम करना नहीं”
एडवोकेट हाशमी ने कहा कि यह सवाल किसी व्यक्ति, मदरसे या संस्था को बदनाम करने के लिए नहीं उठाए जा रहे हैं। उनका कहना है कि मदारिस और दीनी संस्थानों का सम्मान कायम रहना चाहिए और जनता का भरोसा भी बना रहना चाहिए।
उन्होंने कहा कि अगर उनके सवालों में कोई गलतफहमी है तो उलमा-ए-किराम उसकी भी स्पष्ट जानकारी दें, ताकि लोगों के बीच किसी तरह का भ्रम न रहे।
उन्होंने क़ाज़ी-ए-शरियत मुफ़्ती सलीम अहमद क़ासमी और देहरादून के तमाम उलमा से अपील की है कि इस मामले में खामोशी के बजाय स्पष्ट मार्गदर्शन दिया जाए, ताकि चंदा देने वालों और चंदा लेने वालों दोनों के लिए एक साफ और भरोसेमंद व्यवस्था बनाई जा सके।

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