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आत्म स्वरूप में माता पिता का अक्स आज भी मेरी आंखों में बसा है! डा0श्रीगोपालनारसन एडवोकट

मातृ-पितृ दिवस पर

… आत्म स्वरूप में माता पिता का अक्स आज भी मेरी आंखों में बसा है!

डा0श्रीगोपालनारसन एडवोकट
माता पिता के कदमों में ही स्वर्ग होता है। यह एहसास मुझे उस समयहुआ जब मेरे माता पिता नही रहे।माता पिता के हमेशा के लिए चले जाने के बाद मेरे जीवन में जो उदासी व अवसाद आया था और लगा था जैसे माता पिता के चले जाने के बाद मेरी दुनिया सुनी हो गई हो।ऐसा इसी लिए लगा था क्योकि माता पिता के दिवगंत होने के बाद उनके कदमों की जन्नत ने भी मेरा साथ छोड दिया था। मुझे अब न मां की गोद में सिर रखकर मां के ममत्व की अनुभूति हो पा रही थी, न ही मां के ममत्व भरे हाथ मेरे सिर को सहलाने के लिए अब बचे थे और न ही पिता का साया ही मेरे रहा जिस कारण हमेशा के लिए अलविदा हो चुके माता पितां की देह से तो मैं हमेशा के लिए वंंिचत हो गया था परन्तु आत्म स्वरूप में माता पिता का अक्स आज भी मेरी आंखों में बसा है और लगता है कि वे मुझे कदम कदम पर सन्मार्ग दिखा रहे है। शुरू शुरू में तो उठते बैठते चलते फिरते हर जगह मुझे माता पिता  ही नजर आ रहे थे जैसे वे ही मुझे जीवन की राह पर उगंली पकडकर ले जाना चाहते हो। और मै भी माता पिता के अक्स और उनकी यादों के साथ उनके बताए मार्ग पर चल पडा जिस मार्ग पर ले चलने का उन्होने स्वपन बुना था। यानि माता पिता के आदर्शो पर चलने की प्रेरणा ही मेरी सफलता का कारण भी बनी है।हालाकि लौकिक माता पिता के चले जाने के बाद मुझे जो परमपिता परमात्मा की रूहानी गोद प्रजापिता ब्रहमाकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय में राजयोग के माध्यम से मिली है।उससे तो मेरे जीवन की दशा और दिशा ही बदल गई।
मेरे पिताजी मदन लाल शर्मा मेरी मां से तीन साल पहले ही चल बसे थे। 13 फरवरी सन 2009 को 82 वर्ष की आयु में मेरे पिताजी श्री मदन लाल शर्मा दिवंगत हुए तो 82 वर्ष की आयु और 13 फरवरी को ही सन 2012 में मां श्रीमति प्रकाश वती ने महाप्रयाण किया। हांलाकि मेरे पिताजी एक रहमदिल इंसान थे और उनमें मां जैसा ममत्व था।तभी तो मां जब पढने के लिए कहती या फिर पढाई न करने को लेकर डांटती तो पिताजी मां के सामने हमारे लिए ढाल बनकर खडे हो जाते और प्यार से कहते कोई बात नही धीरे धीरे पढ लेगें । कई बार तो मां जब धर पर नही होती और हम भाई बहन रात में मां के निर्देश पर देर रात तक पढ रहे होते तो पिताजी हमें कहते बस बहुत पढाई कर ली अब सो जाओं। मां के बीमार होने या फिर मायके जाने पर भी पिताजी अपने हाथ से खाना बनाकर हमें भाई बहनों को खिलाते थे यानि पिताजी हमारे लिए पिता के साथ साथ दुसरी मां की तरह थे।
मां जो अपने जीवन में कभी स्कूल नही गई थी ,हम भाईयों व बहन की पढाई को लेकर इतनी सजग थी कि बडे भाई श्याम मोहन शर्मा का पालिटेक्निक में एडमिशन कराने के लिए उन्होने अपने जेवर तक बेच दिये थे। वही हम भी पढे और अच्छे नम्बरो से पास हो,इसके लिए मां हर रोज देर रात तक हमे पढने के लिए न सिर्फ कहती बल्कि स्वयं भी रात भर हमारे पास बैठी रहती और देखती रहती कि हम पढ रहे है या नही । उस जमाने में टेलीविजन नये नये आए थे। हमारे गांव नारसन कलां में सिर्फ एक या दो टेलीविजन ही थे।टेलीविजन पर हर रविवार को फीचर फिल्म आती थी और हर बुधवार को चित्रहार टेलीविजन का प्रमुख आकर्षण था। हमारी भी इच्छा होती कि हम फिल्म और चित्रहार देखे परन्तु मां पढाई के कारण इसकी अनुमति नही देती थी। कई बार हमे बुरा भी लगता परन्तु जब हमारा रिजल्ट आता और हम पास होते तो गांव के लोग बोलते कि पास हम नही हमारी मां हुई है। गांव के लोगो की यह बात सोलह आने सच थी क्योकि मां के अपने बच्चो की पढाई के प्रति इसी जुजून के कारण मेरे बडे भाई इंजीनियर श्याम मोहन शर्मा बन पाए और मैं एडवोकेट और मेरा छोटा भाई सुभाष एम काम करके बिजनेस में कामयाब हो पाया।
मां ने हमारे गरीबी के दिनों में भी कभी होंसला नही खोया और पिताजी का साथ निभाने के लिए सन 1965 में अनपढ होते हुए भी सिलाई व कढाई में डिप्लोमा किया और फिर धर में सिलाई कढाई करके धर चलाने में पिताजी की मदद की। मां चूंकि सन 1942 के जनआन्दोलन में तिरंगा फैहराते हुए शहीद हुए 17 वर्षीय जगदीश प्रसाद वत्स की छोटी बहन थी और जब भाई शहीद हुए उस समय मां की उम्र केवल 14 वर्ष की थी। अगले ही वर्ष बेटे के गम में मां बाप के गुजर जाने से मां के जिम्मे मात्र 15 वर्ष की आयु में अपने परिवार की जिम्मेदारी आ गई थी। उन कठिन दिनों में जिम्मेदारी के एहसास और अनुभव से ही मां को वह ताकत मिली थी कि वे जीवन के हर मोड पर सफल रही और हमें कामयाब कर पायी।
एक बात ओर जब धर की बिजली खराब हो जाती या फिर कोई खतरे का काम होता तो मेरे पिताजी उस काम को हमें करने से मना कर देते और पडोस के बच्चों को बुलाकर जब वह काम करने के लिए कहते तो उन्हे ऐसा करने से मां ही रोकती थी। मां का कहना था कि बच्चे चाहे हमारे हो या पडोस क,ेसब एक समान है और जब हम अपने बच्चों को खतरे में नही डाल सकते तो फिर पडोस के बच्चों को खतरे में कैसे डाल सकते है? जिससे स्पष्ट है कि मां अपने या पराये किसी भी बच्चे में कोई भेद नही करती थी।न्याय प्रिय मां ने कभी हमारी गलती को नही छिपाया और कभी दूसरो पर झूठा दोषारोपण नही किया। साथ ही अपनी कोई गलती होती तो सहजता से उसे स्वीकार कर लेना ही मां का स्वभाव था।
अपने जीवन के अन्तिम दिनों में जब मां को भारी पक्षाधात हुआ और मां ने शारिरीक कष्ट झेलते हुए भी कभी अपना दुख ब्यान नही किया बल्कि जब भी मां से उनकी तकलीफ जानने की कौशिश करते तो मां के मुंह से एक ही शब्द निकलता कि वह ठीक है। दरअसल मां नही चाहती थी कि उनके दुख को देखकर कोई दुखी हो। जीवन पर्यन्त स्ंायमी,शांत और सन्तुष्ट रही मां प्रकाशवती के अन्दर राष्टृभक्ति का भाव कूट कूटकर भरा था।उन्हे अपने भाई जगदीश वत्स के राष्टृबलिदान के लिए एक बडे पत्र समूह द्वारा सम्मानित भी किया गया था। मां चाहती थी तत्कालीन अमर शहीद भाई जगदीश प्रसाद वत्स की जीवनी शिक्षा के किसी पाठयक्रम में शामिल हो ताकि आने वाली पीढी देश के शहीदो से प्रेरित होकर राष्टृभक्ति के मार्ग को अपना सके।मां के इस सपने को पूरा करने के लिए उत्तराखण्ड के तत्कालीन मुख्यमन्त्री हरीश रावत ने अमर शहीद जगदीश वत्स की जीवन पाठयक्रम में शामिल करने के निर्देश विभागीय अधिकारियों को दे दिये थे ,लेकिन सरकार बदल जाने के कारण  वे निर्देश आज तक फलित नहीं हो पाए है।(लेखक अखिल भारतीय स्वतंत्रता सेनानी परिवार कल्याण महापरिषद के राष्ट्रीय प्रवक्ता है)
डा0श्रीगोपालनारसन एडवोकेट

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