देहरादून

प्रोग्रेसिव कम्युनिटी कराएगी अज़ान प्रतियोगिता, मदरसों के तालिब-ए-इल्म और मस्जिदों के मुअज्जिन लेंगे हिस्सा

प्रोग्रेसिव कम्युनिटी कराएगी अज़ान प्रतियोगिता, मदरसों के तालिब-ए-इल्म और मस्जिदों के मुअज्जिन लेंगे हिस्सा

 

 

देहरादून। प्रोग्रेसिव कम्युनिटी की ओर से अज़ान प्रतियोगिता का आयोजन किया जा रहा है। प्रतियोगिता का मकसद बच्चों और मस्जिदों में अज़ान देने वाले मुअज्जिनों के बीच अज़ान की खूबसूरती, सही उच्चारण और बेहतर अंदाज़ को प्रोत्साहित करना है। प्रतियोगिता में मदरसों के तालिब-ए-इल्म के साथ-साथ विभिन्न मस्जिदों के मुअज्जिन हजरात भी हिस्सा ले सकेंगे।

आयोजकों के मुताबिक प्रतियोगिता में तालिब-ए-इल्म और मुअज्जिन हजरात के लिए अलग-अलग श्रेणियां निर्धारित की गई हैं। इस तरह दोनों वर्गों के प्रतिभागियों को अपनी-अपनी कैटेगरी में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करने का अवसर मिलेगा।

प्रतियोगिता का आयोजन तीन मराहिल में किया जाएगा। पहले मरहले में शहर और आसपास के मदरसों से प्रतिभागियों का चयन किया जाएगा। प्रत्येक मदरसे से पांच-पांच तालिब-ए-इल्म प्रतियोगिता के लिए चुने जाएंगे। इसके बाद चयनित प्रतिभागियों के बीच सेमीफाइनल मुकाबला आयोजित होगा।

सेमीफाइनल के बाद प्रतियोगिता के अंतिम मरहले यानी फाइनल मुकाबले में तालिब-ए-इल्म की श्रेणी से तीन प्रतिभागियों का चयन किया जाएगा। इसी तरह मुअज्जिन हजरात की श्रेणी से भी तीन प्रतिभागियों को फाइनल के लिए चुना जाएगा। फाइनल में चयनित प्रतिभागियों को अपनी अज़ान की प्रस्तुति देने का अवसर मिलेगा।

आयोजकों ने बताया कि प्रतियोगिता के अंतिम चरण में बेहतर प्रदर्शन करने वाले तीन तालिब-ए-इल्म और तीन मुअज्जिन हजरात को चयनित कर एक विशेष आवामी जलसे में सम्मानित किया जाएगा। इस मौके पर उन्हें पुरस्कार देकर उनकी हौसला-अफजाई की जाएगी।

प्रोग्रेसिव कम्युनिटी के जनरल सेक्रेटरी डॉ. जे. उस्मानी ने बताया कि प्रतियोगिता में हिस्सा लेने के ख्वाहिशमंद तालिब-ए-इल्म, मदरसे के जिम्मेदारान और मस्जिदों के मुअज्जिन हजरात आयोजन से संबंधित जानकारी के लिए दिए गए व्हाट्सऐप नंबरों पर मैसेज के जरिए राब्ता कायम कर सकते हैं।

राब्ता के लिए व्हाट्सऐप नंबर:

📱 9412757440

📱 9286965890

उन्होंने सभी मदरसों के जिम्मेदारों और मस्जिदों के मुअज्जिन हजरात से प्रतियोगिता में अधिक से अधिक संख्या में प्रतिभागियों को शामिल कराने की अपील की, ताकि नई नस्ल के बच्चों में अज़ान के सही उच्चारण और बेहतर अंदाज़ के साथ-साथ दीनी और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ाव को भी बढ़ावा मिल सके।

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