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नैनीताल से हल्द्वानी हाईकोर्ट शिफ्टिंग मामले में फैसला सुरक्षित* 

नैनीताल से हल्द्वानी हाईकोर्ट शिफ्टिंग मामले में फैसला सुरक्षित

नैनीताल। उत्तराखंड उच्च न्यायालय को नैनीताल से हल्द्वानी के बेलबाबा क्षेत्र में स्थानांतरित करने के लिए शासन द्वारा भूमि आरक्षित किए जाने और प्रशासनिक स्वीकृति के खिलाफ दायर याचिका पर गुरुवार को सुनवाई हुई। वरिष्ठ न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी और न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित की खंडपीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।

 

उच्च न्यायालय के अधिवक्ता एवं राज्य आंदोलनकारी रमन शाह ने अपनी याचिका में कहा कि नैनीताल के जिलाधिकारी की रिपोर्ट में बेलबाबा मंदिर के पास रिजर्व फॉरेस्ट की भूमि को उच्च न्यायालय के लिए चिन्हित किया गया है। याचिकाकर्ता के अनुसार यह कदम वन संरक्षण अधिनियम, 1980 की धारा-2 के प्रावधानों का उल्लंघन है।

 

याचिकाकर्ता ने मांग की कि यदि इस मामले में वन कानूनों का उल्लंघन हुआ है तो संबंधित अधिकारियों, विशेष रूप से नैनीताल के जिलाधिकारी के खिलाफ उचित कार्रवाई की जाए। उनका आरोप है कि जब मामले में सर्वोच्च न्यायालय की ओर से रोक लगी हुई थी, उस दौरान मई 2026 में इस भूमि को उच्च न्यायालय के लिए हस्तांतरित करने का प्रस्ताव तैयार किया गया।

 

याचिकाकर्ता ने सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का हवाला देते हुए कहा कि हाईकोर्ट के लिए भूमि नैनीताल जिले में “जहां है, जिस हालत में है” के आधार पर उपलब्ध कराने की बात कही गई थी। ऐसे में प्रशासन ने वन भूमि को ही क्यों चिन्हित किया, जबकि उक्त क्षेत्र में बड़े स्तर पर पौधरोपण भी किया गया है।

 

याचिका में यह भी कहा गया कि प्रस्तावित क्षेत्र हाथी कॉरिडोर से जुड़ा हुआ है। साथ ही राज्य आंदोलन की भावना का हवाला देते हुए कहा गया कि उत्तराखंड राज्य की स्थापना पर्वतीय क्षेत्र की अवधारणा को ध्यान में रखकर हुई थी। ऐसे में राज्य के प्रमुख संस्थान उच्च न्यायालय को पहाड़ से मैदान में स्थानांतरित करने का औचित्य स्पष्ट किया जाना चाहिए। यदि उच्च न्यायालय को स्थानांतरित करना ही है तो इसे पर्वतीय क्षेत्र में ही स्थानांतरित किया जाए।

 

याचिकाकर्ता ने यह भी तर्क दिया कि सर्वोच्च न्यायालय के 15 जुलाई 2026 के आदेश से वन भूमि का स्वरूप नहीं बदलता। उनके अनुसार संबंधित भूमि रिजर्व फॉरेस्ट थी और उत्तराखंड सरकार की 12 अगस्त 2026 की अधिसूचना में भी इसे ‘फॉरेस्ट लैंड’ के रूप में दर्ज किया गया है।

 

याचिकाकर्ता के मुताबिक वन संरक्षण अधिनियम, 1980 के तहत रिजर्व फॉरेस्ट की भूमि को डी-रिजर्व करने का अधिकार न तो सर्वोच्च न्यायालय और न ही उच्च न्यायालय के पास है। इस संबंध में अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास है।

 

वहीं, सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि मामले में आगे की प्रक्रिया जारी है और जिस स्थान पर उच्च न्यायालय को स्थानांतरित किया जाना प्रस्तावित है, वह हाथी कॉरिडोर नहीं है।

 

उच्च न्यायालय को हल्द्वानी स्थानांतरित करने के विरोध में अधिवक्ताओं ने यह सवाल भी उठाया कि जब मामले में स्टे चल रहा था, तब जिलाधिकारी ने मई 2026 में इस भूमि को न्यायालय के लिए हस्तांतरित करने का प्रस्ताव किस आधार पर तैयार किया। उन्होंने संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की।

 

याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि सर्वोच्च न्यायालय के आदेश में नैनीताल जिले में उपलब्ध भूमि के आधार पर उच्च न्यायालय को स्थानांतरित करने की बात कही गई है। ऐसे में सरकार केवल हल्द्वानी में ही हाईकोर्ट शिफ्ट करने पर क्यों जोर दे रही है, जबकि नैनीताल जिले के अन्य क्षेत्रों में भी भूमि उपलब्ध हो सकती है।

 

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद खंडपीठ ने मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है।

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