उत्तर प्रदेश

*दो बहनों का इस्लाम कबूल करना, धर्म, निकाह और आज़ादी: संविधान क्या कहता है?*

दो बहनों का इस्लाम कबूल करना, धर्म, निकाह और आज़ादी: संविधान क्या कहता है?

आज हम बात करेंगे एक ऐसे मामले की, जिसने एक बार फिर भारतीय संविधान में दी गई मज़हबी आज़ादी, शख़्सी आज़ादी और अपनी ज़िंदगी के फैसले खुद करने के हक़ को लेकर अहम बहस छेड़ दी है।

मामला उत्तर प्रदेश के आगरा ज़िले से जुड़ा है, जहाँ दो बालिग बहनों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया है। याचिका में कहा गया है कि दोनों बहनों ने अपनी मरज़ी और रज़ामंदी से हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम कबूल किया और अपनी पसंद के लोगों से निकाह करने का फैसला किया।

याचिका में यह भी दावा किया गया है कि उनके इस फैसले से नाराज़ होकर उनके पिता ने पुलिस में मुकदमा दर्ज कराया और दोनों को उनकी इच्छा के ख़िलाफ़ घर में रोके रखने का आरोप लगाया गया है। इन आरोपों की सत्यता पर अभी अदालत अंतिम निर्णय नहीं दे चुकी है।

इसी मामले की सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट की एकलपीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार, पुलिस अधिकारियों और संबंधित पक्षों को निर्देश दिया है कि दोनों महिलाओं को 6 अगस्त 2026 को अदालत में हर हाल में पेश किया जाए, ताकि अदालत खुद यह जान सके कि वे अपनी आज़ाद मरज़ी से रह रही हैं या नहीं।

दर्शकों, भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 हर नागरिक को अपने धर्म को मानने, उसका पालन करने और उसका प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है। यह अधिकार केवल किसी एक मज़हब के मानने वालों के लिए नहीं, बल्कि भारत के हर नागरिक के लिए बराबर है।

इसी तरह अनुच्छेद 21 हर व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है। सुप्रीम कोर्ट भी अपने कई फ़ैसलों में साफ़ कर चुका है कि यदि कोई व्यक्ति बालिग है और मानसिक रूप से सक्षम है, तो उसे अपनी पसंद से जीवनसाथी चुनने और अपनी ज़िंदगी के अहम फैसले लेने का अधिकार है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी प्रारंभिक सुनवाई में यही कहा कि यदि याचिका में लगाए गए आरोप सही पाए जाते हैं, तो किसी भी तीसरे पक्ष द्वारा किसी बालिग व्यक्ति की मज़हबी पसंद, शादी या रहने की जगह में दख़ल देना, संविधान से मिले गरिमा, निजता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकारों का उल्लंघन हो सकता है।

हालाँकि यह भी उतना ही ज़रूरी है कि अदालत पहले सभी तथ्यों की तस्दीक करे। यही वजह है कि कोर्ट ने दोनों महिलाओं को अपने सामने पेश करने का आदेश दिया है। अदालत यह सुनिश्चित करना चाहती है कि उनका हर फैसला उनकी अपनी आज़ाद मरज़ी का नतीजा है, न कि किसी दबाव या ज़बरदस्ती का।

अगर अदालत के आदेश के बावजूद महिलाओं को पेश नहीं किया जाता, तो संबंधित पुलिस अधिकारियों को व्यक्तिगत हलफ़नामा दाख़िल कर इसकी वजह बतानी होगी।

दोस्तों, भारत एक लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष मुल्क है। यहाँ संविधान की नज़र में हर नागरिक बराबर है। किसी भी इंसान की पहचान, उसका मज़हब और उसकी निजी ज़िंदगी से जुड़े फैसलों का सम्मान करना हम सबकी ज़िम्मेदारी है। साथ ही, अगर किसी मामले में विवाद हो, तो उसका अंतिम फैसला अदालत और कानून के ज़रिए ही होना चाहिए, न कि भावनाओं या दबाव के आधार पर।

अब इस मामले में 6 अगस्त को अदालत में होने वाली सुनवाई पर सबकी निगाहें टिकी हैं। उसी दिन यह साफ़ होगा कि दोनों महिलाओं का पक्ष क्या है और आगे अदालत क्या रुख़ अपनाती है।

फ़िलहाल, इस मामले में अंतिम फैसला आना अभी बाकी है, इसलिए किसी भी नतीजे पर पहुँचना जल्दबाज़ी होगी।

LEAVE A RESPONSE

Your email address will not be published. Required fields are marked *