देहरादून

नशा, जुआ और बेहयाई समाज के लिए गंभीर चुनौती: शहर क़ाज़ी देहरादून* 

नशा, जुआ और बेहयाई समाज के लिए गंभीर चुनौती: शहर क़ाज़ी देहरादून

 

जुमे के बयान में इस्लामी शिक्षाओं पर अमल करने और सामाजिक बुराइयों से दूर रहने की अपील

 

देहरादून। शहर क़ाज़ी मुफ्ती हशीम अहमद क़ासमी ने नशा, जुआ और बेहयाई जैसी सामाजिक बुराइयों पर चिंता जताते हुए लोगों से इनसे दूर रहने की अपील की। जुमे की नमाज़ से पहले अपने बयान में उन्होंने कहा कि ये बुराइयां न केवल इंसान की ज़िंदगी को प्रभावित करती हैं, बल्कि परिवार की खुशहाली, बच्चों के भविष्य और समाज के नैतिक मूल्यों को भी नुकसान पहुंचाती हैं।

 

शहर क़ाज़ी ने कहा कि नशे की लत इंसान की सोचने-समझने की क्षमता को कमजोर करने के साथ उसकी आर्थिक स्थिति को भी बिगाड़ देती है। नशे के कारण व्यक्ति अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा बर्बाद कर देता है, जिससे परिवार में तनाव और घरेलू विवाद बढ़ने लगते हैं। इसका असर बच्चों की परवरिश पर भी पड़ता है और कई बार व्यक्ति अपने पारिवारिक दायित्वों को निभाने में असफल हो जाता है।

 

उन्होंने जुआ और सट्टेबाजी को भी सामाजिक और आर्थिक बर्बादी का बड़ा कारण बताया। उनके मुताबिक, मेहनत और ईमानदारी से कमाने के बजाय बिना मेहनत के पैसा हासिल करने की चाहत लोगों को कर्ज़ और आर्थिक संकट में धकेल देती है। कई परिवार अपनी जमा-पूंजी गंवा बैठते हैं, जिससे घरेलू परेशानियां बढ़ती हैं और रिश्तों में तनाव पैदा होता है।

 

बयान में बेहयाई और अनैतिक आचरण के बढ़ते प्रभाव पर भी चिंता जताई गई। शहर क़ाज़ी ने कहा कि किसी भी समाज की मजबूती उसके नैतिक मूल्यों, आपसी सम्मान, शर्म-हया और पारिवारिक रिश्तों की पवित्रता पर निर्भर करती है। जब इन मूल्यों को नज़रअंदाज़ किया जाता है, तो परिवारों में विश्वास और सामाजिक जिम्मेदारी की भावना कमजोर होने लगती है।

 

उन्होंने कहा कि इस्लाम पुरुषों और महिलाओं, दोनों को मर्यादा, सम्मान और जिम्मेदारी के साथ जीवन जीने की शिक्षा देता है। इंसान को अपनी नज़र, व्यवहार और चरित्र की हिफाज़त करनी चाहिए तथा दूसरों के सम्मान और अधिकारों का भी ख्याल रखना चाहिए।

 

इस्लामी शिक्षाओं का उल्लेख करते हुए शहर क़ाज़ी ने बताया कि पवित्र कुरआन में नशे और जुए से दूर रहने की स्पष्ट हिदायत दी गई है। सूरह अल-माइदा की आयत 90 में शराब और जुए से बचने का आदेश दिया गया है। इसी तरह सूरह अल-इसरा की आयत 32 में व्यभिचार के करीब जाने तक से मना किया गया है। इन शिक्षाओं का उद्देश्य इंसान के चरित्र, परिवार और समाज की हिफाज़त करना है।

 

उन्होंने कहा कि समाज में सुधार लाने के लिए केवल दूसरों की गलतियों पर चर्चा करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि हर व्यक्ति को अपने आचरण में सुधार लाने की जरूरत है। माता-पिता की जिम्मेदारी है कि वे बच्चों की अच्छी परवरिश करें, उन्हें सही और गलत के बीच अंतर समझाएं तथा मोबाइल और इंटरनेट के इस्तेमाल के संबंध में उचित मार्गदर्शन दें।

शहर क़ाज़ी ने युवाओं से अपील की कि वे बुरी संगत से बचें और अपनी ऊर्जा, समय तथा प्रतिभा को शिक्षा, मेहनत, रोजगार और समाज की बेहतरी के लिए इस्तेमाल करें। उन्होंने कहा कि ईमानदारी, अच्छे अख़लाक़ और जिम्मेदार व्यवहार को अपनाकर ही एक बेहतर समाज की नींव रखी जा सकती है।

 

अंत में उन्होंने लोगों से अपील की कि वे नशा, जुआ और अनैतिक आचरण जैसी बुराइयों से स्वयं भी बचें और दूसरों को भी प्यार, समझदारी तथा अच्छे व्यवहार के साथ इनसे दूर रहने की सलाह दें। उन्होंने कहा कि समाज की तरक्की केवल आर्थिक विकास से नहीं, बल्कि अच्छे चरित्र, मजबूत परिवार, आपसी सम्मान और नैतिक मूल्यों से भी होती है। इस्लामी शिक्षाओं पर अमल करके एक शांतिपूर्ण, सुरक्षित और बेहतर समाज के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया जा सकता है।

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