मसूरी की कार्रवाई पर उठे सवाल: जहाँ दफन हैं महान स्वतंत्रता सेनानी अब्बास तैयबजी, वहीं चला बुलडोज़र
मसूरी की कार्रवाई पर उठे सवाल: जहाँ दफन हैं महान स्वतंत्रता सेनानी अब्बास तैयबजी, वहीं चला बुलडोज़र
*ऐतिहासिक विरासत, धार्मिक आस्था और प्रशासनिक कार्रवाई के बीच खड़ा हुआ बड़ा सवाल*
देहरादून/मसूरी। उत्तराखंड की पर्यटन नगरी मसूरी में शनिवार तड़के हुई प्रशासनिक कार्रवाई ने एक नए विवाद को जन्म दे दिया है। लक्ष्मणपुरी क्षेत्र स्थित मुस्लिम कब्रिस्तान परिसर में बने एक टिनशेड ढांचे को भारी पुलिस बल की मौजूदगी में बुलडोज़र से हटाए जाने के बाद स्थानीय लोगों में आक्रोश फैल गया। विरोध-प्रदर्शन हुए, राष्ट्रीय राजमार्ग पर जाम लगाया गया और पूरे घटनाक्रम ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए।
लेकिन यह मामला केवल एक ढांचा हटाने तक सीमित नहीं है। सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि मस्जिद प्रबंधन समिति के अनुसार इसी कब्रिस्तान में देश के महान स्वतंत्रता सेनानी अब्बास तैयबजी की मजार स्थित है। यही कारण है कि इस कार्रवाई को स्थानीय लोग केवल अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई नहीं, बल्कि देश की ऐतिहासिक विरासत से जुड़े एक संवेदनशील स्थल पर हुई कार्रवाई के रूप में भी देख रहे हैं।
अब्बास तैयबजी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उन महान सेनानियों में शामिल थे जिन्होंने अंग्रेजी हुकूमत की ऊँची सरकारी नौकरी और सुख-सुविधाओं को त्यागकर महात्मा गांधी के नेतृत्व में आजादी की लड़ाई में स्वयं को समर्पित कर दिया था। नमक सत्याग्रह के दौरान जब महात्मा गांधी गिरफ्तार हुए, तब आंदोलन की कमान अब्बास तैयबजी ने संभाली थी। उनका नाम भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में सम्मान के साथ दर्ज है।
मस्जिद प्रबंधन समिति के सचिव मोहम्मद शाहिद का कहना है कि जिस टिनशेड को हटाया गया, वह नियमित नमाज के लिए इस्तेमाल होने वाली मस्जिद नहीं थी, बल्कि वर्ष 2009 में जनाजे की नमाज अदा करने और कब्रिस्तान आने वाले लोगों को धूप और बारिश से बचाने के उद्देश्य से बनाया गया था। उनका दावा है कि प्रशासन द्वारा जारी नोटिस का समय पर जवाब दिया गया था तथा सभी आवश्यक दस्तावेज भी उपलब्ध करा दिए गए थे। समिति के अनुसार पहले प्रशासन के निर्देश पर मीनार भी स्वयं हटा दी गई थी, इसके बावजूद सुबह तड़के बुलडोज़र चलाकर कार्रवाई की गई और समिति के लोगों को मौके पर जाने तक की अनुमति नहीं दी गई।
समिति का यह भी दावा है कि वर्ष 1911 से यहां मुस्लिम कब्रिस्तान मौजूद है तथा वर्ष 1929 के आधिकारिक नक्शे में भी कब्रिस्तान और मस्जिद का उल्लेख दर्ज है। उनका कहना है कि यदि भूमि को लेकर कोई कानूनी विवाद था तो उसका समाधान बातचीत और आपसी सहमति से निकाला जा सकता था। उनका आरोप है कि ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व वाले स्थल के मामले में प्रशासन को अधिक संवेदनशीलता दिखानी चाहिए थी।
दूसरी ओर प्रशासन ने कार्रवाई को पूरी तरह कानूनी बताया है। प्रशासन के अनुसार राजस्व विभाग, नगर पालिका परिषद, छावनी परिषद और वक्फ बोर्ड के अभिलेखों की संयुक्त जांच में संबंधित भूमि नगर पालिका परिषद की पाई गई। प्रशासन का कहना है कि संबंधित पक्ष को तीन बार नोटिस जारी किए गए थे, लेकिन निर्धारित समय के भीतर अतिक्रमण नहीं हटाया गया। इसके बाद नियमानुसार पुलिस बल की मौजूदगी में कार्रवाई की गई।
हालांकि, प्रशासनिक कार्रवाई के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि यदि किसी स्थान का संबंध देश के एक महान स्वतंत्रता सेनानी की स्मृति और ऐतिहासिक विरासत से जुड़ा हो, तो क्या ऐसी कार्रवाई से पहले अधिक संवाद, संवेदनशीलता और वैकल्पिक समाधान तलाशे जा सकते थे?
मसूरी की यह घटना अब केवल प्रशासनिक कार्रवाई का विषय नहीं रह गई है। यह इतिहास, विरासत, जनभावनाओं और कानून के बीच संतुलन स्थापित करने की चुनौती भी बन गई है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इस पूरे मामले पर प्रशासन और संबंधित पक्षों के बीच आगे क्या समाधान निकलता है।



